भारत के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू और औरंगजेब के नाम ऐसे हैं, जो इतिहास में हमेशा चर्चा का विषय रहे हैं। नेहरू की मृत्यु को 60 साल से अधिक हो चुके हैं, जबकि औरंगजेब को 300 साल हो चुके हैं। इसके बावजूद, आज भी इन दोनों व्यक्तियों पर बहसें होती रहती हैं।
औरंगजेब, एक ऐसा बादशाह जिसने लगभग आधी सदी तक हिंदुस्तान पर राज किया, आज भी विभिन्न दृष्टिकोणों से देखा जाता है।
कुछ लोग उसे कट्टरपंथी मानते हैं, जिसने मंदिरों को तुड़वाया और अपने भाइयों की हत्या की, जबकि कुछ लोग उसे एक ऐसा नेता मानते हैं जिसने सख्ती से शासन किया और एक विशाल साम्राज्य स्थापित किया।
दूसरी ओर, नेहरू, जिन्होंने आधुनिक भारत के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, उनके विचारों का भी इस संदर्भ में महत्व है। जब औरंगजेब पर बहस होती है, तो यह जानना आवश्यक है कि नेहरू ने औरंगजेब के बारे में क्या सोचा और उनके शासन के बारे में उनके विचार क्या थे।
नेहरू ने अपनी प्रसिद्ध किताब "डिस्कवरी ऑफ इंडिया" में औरंगजेब का उल्लेख किया है। यह किताब सिर्फ एक ऐतिहासिक ग्रंथ नहीं है, बल्कि नेहरू की गहरी समझ और दृष्टिकोण का प्रतिबिंब है। उन्होंने औरंगजेब के शासनकाल को एक पतन के युग के रूप में देखा।
उनके अनुसार, औरंगजेब ने धार्मिक कट्टरता के चलते अपने साम्राज्य को कमजोर किया। उन्होंने अपने भाई दारा शिकोह की हत्या की और खुद को कट्टर इस्लामिक नेता के रूप में स्थापित किया। औरंगजेब की नीतियों ने न केवल हिंदुओं को नाराज किया, बल्कि राजपूतों और सिखों को भी विद्रोह के लिए प्रेरित किया।
इस ब्लॉग में, हम नेहरू के दृष्टिकोण को गहराई से समझेंगे, उनके द्वारा किए गए विश्लेषण को देखेंगे और यह जानने की कोशिश करेंगे कि क्यों नेहरू ने औरंगजेब को "कोई शासक नहीं" कहा।
क्या यह सिर्फ नेहरू का व्यक्तिगत दृष्टिकोण था, या यह एक व्यापक ऐतिहासिक सत्य का प्रतिनिधित्व करता है? आइए, इस विषय पर चर्चा करें और नेहरू की दृष्टि को समझें।
नेहरू का औरंगजेब के प्रति दृष्टिकोण
नेहरू के अनुसार, औरंगजेब का शासनकाल भारत के लिए एक पतन का काल था। उन्होंने लिखा कि औरंगजेब ने "घड़ी को उल्टा घुमाने" का प्रयास किया, लेकिन इसके परिणामस्वरूप साम्राज्य का विघटन हुआ।
नेहरू ने इसे एक ऐसे शासक के रूप में देखा, जिसने धार्मिक सहिष्णुता को नकारा और इस्लाम के कट्टर रूप को अपनाया। यह न केवल उसकी नीतियों का परिणाम था, बल्कि उसकी व्यक्तिगत पहचान भी थी।
धार्मिक कट्टरता और नीतियों का प्रभाव
नेहरू ने देखा कि औरंगजेब की धार्मिक कट्टरता ने उसके शासन को नकारात्मक रूप से प्रभावित किया। उसने जजिया कर को पुनः लागू किया और कई हिंदू मंदिरों को नष्ट किया। उसके इस व्यवहार ने न केवल हिंदुओं को नाराज किया, बल्कि राजपूतों और सिखों को भी विद्रोह के लिए प्रेरित किया।
नेहरू ने लिखा, "औरंगजेब ने अपने पूर्वजों द्वारा किए गए कामों पर पानी फेरने का प्रयास किया। वह धर्मांध और कठोर नैतिकता वादी था।" यह स्पष्ट है कि नेहरू ने औरंगजेब को एक ऐसे शासक के रूप में देखा, जिसने भारत की विविधता को समझने में असफलता दिखाई।
औरंगजेब की प्रशासनिक नीतियाँ
हालांकि नेहरू ने औरंगजेब की नीतियों की आलोचना की, लेकिन उन्होंने उसकी प्रशासनिक क्षमताओं को भी मान्यता दी।
उनका कहना था कि औरंगजेब ने अपनी मिलिट्री ब्रिलियंस के चलते कई विद्रोहों को काबू में रख रखा था। इसके बावजूद, उसकी असहिष्णुता और राजनीतिक दूरदर्शिता की कमी ने अंततः मुगलों के पतन का रास्ता तैयार किया।
दक्कन नीति और उसके परिणाम
नेहरू ने औरंगजेब की दक्कन नीति की भी आलोचना की। उन्होंने कहा कि लंबे समय तक चलने वाले मिलिट्री अभियानों ने साम्राज्य की ताकत को कमजोर कर दिया। औरंगजेब की दक्कन में विजय की चाह ने उसके साम्राज्य के संसाधनों को खत्म कर दिया।
उनका कहना था, "मराठों के खिलाफ दक्षिण में लंबे समय तक चले युद्धों ने साम्राज्य की ताकत को खत्म कर दिया।" यह स्पष्ट है कि औरंगजेब की दक्कन नीति ने उसके साम्राज्य को कमजोर बना दिया।
क्या औरंगजेब एक हिंदू विरोधी शासक था?
नेहरू के विचारों के अनुसार, औरंगजेब एक हिंदू विरोधी शासक था। लेकिन क्या यह सच था? औरंगजेब ने कई हिंदू और जैन मंदिरों की रक्षा की और उनकी भागीदारी को बढ़ावा दिया। इस प्रकार, यह कहना कि वह केवल हिंदू विरोधी था, पूरी तरह से सही नहीं है।
दारा शिकोह और उसकी भूमिका
नेहरू ने यह भी कहा कि अगर दारा शिकोह को सत्ता मिलती, तो भारत अधिक सांस्कृतिक रूप से समावेशी और सहिष्णु राष्ट्र बन सकता था। दारा शिकोह को एक लिबरल मुस्लिम माना जाता था, जिसने उपनिषदों का अनुवाद किया और हिंदू और मुस्लिम के बीच समन्वय की कोशिश की।
निष्कर्ष: नेहरू का औरंगजेब के प्रति दृष्टिकोण
नेहरू का औरंगजेब के प्रति दृष्टिकोण एक गहरी ऐतिहासिक समझ का परिणाम था। उन्होंने औरंगजेब को एक कट्टरपंथी शासक के रूप में देखा, जिसकी नीतियों ने मुगलों के पतन का रास्ता तैयार किया। उनकी दृष्टि ने हमें यह सोचने पर मजबूर किया कि क्या वास्तव में औरंगजेब एक ऐसा शासक था जो अपने समय को समझने में असफल रहा।
Also Read: छत्रपति शिवाजी के असली वंशज राजपूत थे? मराठा या राजस्थानी – सच्चाई क्या है?
तालिका: औरंगजेब और नेहरू के विचार
विषय | नेहरू का दृष्टिकोण | औरंगजेब का दृष्टिकोण |
---|---|---|
धार्मिक नीति | कट्टरता और असहिष्णुता | इस्लामिक कट्टरता के प्रति झुकाव |
प्रशासनिक क्षमता | शक्तिशाली लेकिन दूरदर्शिता की कमी | साम्राज्य की स्थिति को नहीं समझा |
दक्कन नीति | कमजोर करने वाली | युद्धों में संसाधनों की बर्बादी |
दारा शिकोह | संवेदनशील और सहिष्णु | प्रतिस्पर्धा और विद्रोह का कारण |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
1. क्या नेहरू ने औरंगजेब को एक शासक नहीं माना?
हां, नेहरू ने औरंगजेब को "कोई शासक नहीं" कहा, यह बताते हुए कि उसकी नीतियों ने साम्राज्य को कमजोर किया।
2. क्या औरंगजेब की नीतियाँ हिंदू विरोधी थीं?
नेहरू के अनुसार, औरंगजेब की नीतियाँ कट्टर थीं, लेकिन कुछ इतिहासकारों का मानना है कि उसने कई हिंदू मंदिरों को भी संरक्षित किया।
3. दारा शिकोह का महत्व क्या था?
दारा शिकोह को एक लिबरल मुस्लिम माना जाता था, जिसने हिंदू और मुस्लिम के बीच समन्वय की कोशिश की। नेहरू का मानना था कि अगर उसे सत्ता मिलती, तो भारत अधिक सहिष्णु होता।
4. नेहरू की दृष्टि में औरंगजेब का शासनकाल किस प्रकार का था?
नेहरू ने औरंगजेब के शासनकाल को भारत और मुगलों के लिए पतन का काल माना।
निष्कर्ष
इस प्रकार, नेहरू का औरंगजेब के प्रति दृष्टिकोण न केवल उनके ऐतिहासिक ज्ञान को दर्शाता है, बल्कि यह भी बताता है कि कैसे एक शासक की नीतियाँ साम्राज्य के पतन का कारण बन सकती हैं।
नेहरू ने हमें यह सोचने पर मजबूर किया कि इतिहास में व्यक्तियों की भूमिका और उनके निर्णय कितने महत्वपूर्ण होते हैं। यदि हम अपने इतिहास को समझने में असफल रहते हैं, तो हम अपने भविष्य को भी खो देंगे।