इतिहास में कुछ नाम ऐसे होते हैं, जिनसे जुड़ी कहानियाँ और विवाद कभी खत्म नहीं होते। औरंगजेब, मुगलों के सबसे विवादास्पद सम्राटों में से एक, उन्हीं में से एक है। कोई उसे कत्तल का बादशाह कहता है, तो किसी के लिए वह एक नायक है।
लेकिन इन सब बहसों और राजनीतिक विवादों के बीच, औरंगजेब की असली कहानी अक्सर धुंधली हो जाती है। क्या आप जानते हैं कि 50 साल तक हिंदुस्तान पर राज करने वाला यह सम्राट अपने जीवन के आखिरी 27 साल दक्कन में बिताने को मजबूर क्यों हुआ?
यह वही औरंगजेब था जिसने सत्ता की लालसा में अपने भाइयों का खून बहाया, अपने पिता शाहजहाँ को बंदी बनाया और अकबर की गंगा-जमुनी तहजीब को खत्म कर दिया। उसने जजिया कर फिर से लगाई और छत्रपति संभाजी महाराज को यातनाएँ दीं।
लेकिन आखिर ऐसा क्या हुआ कि यह शक्तिशाली मुगल सम्राट, जिसकी कब्र दिल्ली या आगरा में नहीं, बल्कि दक्कन की वीरान जमीन पर बनी? क्या यह उसकी धार्मिक कट्टरता का नतीजा था या मराठाओं से मिली हार की एक खामोश गवाही? क्या यह मुगलों के अंत की शुरुआत थी या फिर औरंगजेब की अपनी गलतियों का परिणाम?
उसके आखिरी समय में वह क्या कर रहा था और क्या उसे अपने किए पर पछतावा था? आज हम इसी औरंगजेब की कहानी सुनेंगे, जिसे इतिहास ने दर्ज तो किया, लेकिन लोग अक्सर उस कहानी को नजरअंदाज कर देते हैं।
औरंगजेब का जन्म 1618 में हुआ था और वह उत्तर भारत की सबसे बड़ी सल्तानत के सिंहासन पर विराजमान था। उसके राज्य को हर साल ₹45 लाख कर के रूप में प्राप्त होते थे, लेकिन उसने इस रकम का एक भी पैसा अपनी अय्याशी पर खर्च नहीं किया।
उसका ज्यादातर खर्च अपने विरोधियों से लड़ाई करने और मुगल सेना के विस्तार पर होता था। इसी वजह से उसके पास उस समय की सबसे बड़ी सेना थी, जिसमें कुल 9 लाख सैनिक थे। औरंगजेब ने अपने शासनकाल का अधिकतर समय युद्ध लड़ते हुए गुजारा।
बूढ़ा हो जाने पर भी, जब वह हाथी-घोड़ों पर सवार नहीं हो सकता था, तो भी पालकी में बैठकर लड़ाई के मैदान में जाता था। कहा जाता है कि रात के वक्त जब उसकी सेना सो जाती थी, तब वह लाठी पकड़कर सैनिक शिविर के बीच में घूमता रहता था।
जब मराठों ने उत्तर भारत की तरफ बढ़ना शुरू किया, तो औरंगजेब ने अपने पूरे लश्कर के साथ दक्षिण की ओर प्रस्थान किया और अगले 26 सालों तक मराठों से लगातार युद्ध लड़ता रहा। 1700 के दशक की शुरुआत में, उसकी सेहत गिरने लगी।
लगातार युद्धों ने उसे मानसिक और शारीरिक रूप से कमजोर कर दिया। मराठों और राजपूतों से हुए युद्धों में वह असफल रहा और इसी नाकामयाबी ने मुगल साम्राज्य को आर्थिक रूप से कमजोर कर दिया।
आखिरी पत्र: पछतावा और आत्ममंथन
1705 और 1706 में, उसने अहमदनगर के आसपास काफी समय बिताया। अपने अंत के करीब, उसने अपने बेटों को दुख भरे पत्र लिखे।
एक पत्र में उसने लिखा, "मैंने दुनिया में जो किया उसका कोई मतलब नहीं। शायद मेरे गुनाह ऐसे नहीं हैं जिन्हें माफ किया जा सके। मैं अकेला आया था और एक अजनबी की तरह दुनिया से जाऊंगा। मैं नहीं जानता कि मैं कौन हूं और मैं क्या कर रहा था।" उसने लिखा, "राज करने के दौरान मैंने जो कुछ भी किया, उसने बस दुख और निराशा छोड़ी है।"
इतिहासकार बताते हैं कि जब औरंगजेब मौत के बेहद करीब थे, तो उनका चेहरा एकदम सफेद हो गया था। उनके कांपते हुए होठों से वह कुछ बड़बड़ा रहे थे, लेकिन गले में इतनी आवाज नहीं बची थी कि वह बाहर निकल सके।
उनके बेटे आजम ने अपने पिता के हाथों को देखा, जिनकी उंगलियों में अंगूठियां बोझ बन चुकी थीं। उसे विश्वास नहीं हो रहा था कि यह वही उंगलियां थीं जिन्होंने मुगल सल्तनत को इस ऊंचाई पर पहुंचाया।
3 मार्च 1707 को औरंगजेब की मौत हो गई। लेकिन उनकी कहानी यहीं खत्म नहीं होती। ताउम्र औरंगजेब ने कई लड़ाइयाँ लड़ीं, कभी जंग के मैदान में तो कभी अपने उसूलों से। औरंगजेब ने 1658 से 1707 तक लगभग 50 सालों तक भारत पर शासन किया, लेकिन इतिहासकारों की नजर में वह कभी पसंदीदा नहीं रहा।
सत्ता की भूख का परिणाम
आखिरी दिनों में, औरंगजेब की स्थिति बहुत खराब थी। दक्कन में ही उनके जीवन के आखिरी 26 साल बीते। इतिहासकार स्टेनली वॉलपर्ट अपनी किताब "न्यू हिस्ट्री ऑफ इंडिया" में लिखते हैं, "औरंगजेब ने दक्कन को जीतने के लिए 26 साल लगाए, लेकिन अंत में उन्हें सिर्फ पिरिक विक्ट्री नसीब हुई।" पिरिक विक्ट्री का मतलब है वह जीत जिससे इतना नुकसान हुआ हो कि उससे अच्छा तो हार जाना था।
जब औरंगजेब 1682 में दक्कन की ओर आए, तो उनके साथ पूरा कारवा आया। वाल्पोर्ट के अनुसार, यह चलती फिरती राजधानी थी। उनके काफिले में 250 बाजार, 500 ऊंट और 300 हाथी शामिल थे। यह सब कुछ उस पैसे का खर्च था जो औरंगजेब ने दक्कन में जीतने की सनक में बहाया।
साम्राज्य का पतन
1705 आते-आते, औरंगजेब की उम्र 86 साल हो गई थी। जाहिर है, अब उसमें वह ताकत नहीं बची थी। दक्कन पर कब्जा बनाए रखना भी मुश्किल साबित हो रहा था। इसी समय, बीजापुर में कैंपेन के दौरान, औरंगजेब को लगा कि अब दिल्ली वापस लौट जाना चाहिए, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी।
1705 में, कृष्णा नदी के किनारे देवापुर में उनकी तबीयत अचानक बहुत खराब हो गई। इसके चलते काफिले को रोकना पड़ा। अगले 6 महीनों तक मुगल बादशाह को यहीं रुकना पड़ा। 20 जनवरी 1706 को औरंगजेब अहमदनगर पहुंचे, लेकिन वह आगे जाने की हालत में नहीं थे।
बेमारी के बावजूद, औरंगजेब सबको यकीन दिलाते रहे कि वह अभी भी जिंदा हैं। उन्हें डर था कि उनकी मौत के बाद उनके बेटे गद्दी के लिए लड़ मरेंगे। उनके आखिरी वक्त में, उनका बेटा आजम उनके खत को पढ़कर अहमदनगर उन्हें देखने आया। उसे अपने पिता की हालत को देखकर रोना आ गया।
दफन और अंतिम इच्छाएं
3 मार्च 1707 को, औरंगजेब ने आखिरी सांस ली। उनके शरीर को दिल्ली नहीं ले जाया गया। उनके बेटे आजम और बेटी जीनतुल निसा ने अपने पिता के शरीर को महाराष्ट्र के औरंगाबाद जिले स्थित खुलदाबाद ले जाने का निर्णय लिया। औरंगजेब चाहते थे कि जहाँ उनकी मौत हो वहीं उन्हें दफनाया जाए।
खुलदाबाद में, औरंगजेब को शेख जैनुद्दीन साहब की दरगाह के पास एक कब्र में दफनाया गया। उनकी कब्र को लाल पत्थर से ढका गया। औरंगजेब ने अपनी अंतिम इच्छाओं में कहा था कि उनकी कब्र पर कोई पक्की इमारत ना खड़ी की जाए, बस एक चबूतरा बनाया जा सकता है।
निष्कर्ष
औरंगजेब ने 88 साल की जिंदगी जी, अपने भाइयों की हत्या की, पिता को कैद में डाला, सिख गुरुओं को सताया, मंदिर तोड़े और कट्टर इस्लामिक नीतियों को अपनाया। उसकी सत्ता की भूख और कठोर नीतियाँ उसे अकेला और कमजोर बना देती हैं। उसके आखिरी दिन हमें यह सोचने पर मजबूर करते हैं कि क्या वास्तव में उसने अपनी सल्तनत को ऊंचाई पर पहुंचाया या फिर अपनी नीतियों ने उसे पतन की ओर धकेल दिया।
सामान्य प्रश्न
- औरंगजेब का सबसे बड़ा पछतावा क्या था?
उसने अपने जीवन में किए गए कार्यों पर पछताया और महसूस किया कि उसने केवल दुख और निराशा छोड़ी है।
- औरंगजेब की कब्र कहाँ है?
औरंगजेब को खुलदाबाद में दफनाया गया था।
- औरंगजेब का शासनकाल कब तक था?
औरंगजेब ने 1658 से 1707 तक शासन किया।
- क्या औरंगजेब ने जजिया कर फिर से लागू किया था?
हाँ, उसने 1679 में जजिया कर को दोबारा लागू किया था।
- औरंगजेब की अंतिम इच्छाएं क्या थीं?
उसने अपनी कब्र पर कोई पक्की इमारत नहीं बनाने की इच्छा जताई थी।
इस कहानी के माध्यम से हमें यह समझ में आता है कि इतिहास में हर व्यक्ति का एक पहलू होता है। औरंगजेब की कहानी हमें यह सिखाती है कि सत्ता की भूख और कठोर नीतियाँ अंततः शासक को अकेला और कमजोर बना देती हैं।